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दैनिक अध्ययन

दृढ़निश्चय

 

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MARCH 21, 2016

[बाइबल पाठ: रूत 1:8-18]

टेलिविज़न पर युद्ध से ध्वस्त एक देश से विस्थापित हुए शरणार्थियों की बदहाल दशा पर रिपोर्ट प्रसारित हो रही थी। उन शरणार्थियों में एक दस वर्षीय लड़की की दृढ़निश्चयता को देखकर मैं चकित हुआ; यद्यपि उनके वापस अपने देश लौट पाने कि संभावनाएं ना के बराबर थीं परन्तु फिर भी उसने बड़े दृढ़ विश्वास के साथ कहा, “जब हम वापस जाएंगे तब मैं फिर से अपने पड़ौसियों से मिलने जाऊँगी, अपनी सहेलियों के साथ खेलूँगी; मेरे पिताजी कहते हैं कि हमारा घर अब नहीं रहा है, लेकिन मैं कहती हूँ कि हम लौटकर उसे फिर से बना लेंगे।

जीवन में कुछ बातों के प्रति दृढ़निश्चय रहने का स्थान अवश्य ही है, विशेषकर तब जब वे बातें परमेश्वर में हमारे विश्वास तथा हमारे द्वारा औरों के प्रति प्रेम दर्शाने से संबंधित हो।

परमेश्वर के वचन बाइबल में रूत की पुस्तक का आरंभ होता है तीन महिलाओं के विवरण से जो एक त्रासदी में होकर एक दूसरे से जुड़ी हैं। अपने पति और दोनों बेटों की मृत्यु के पश्चात मोआब में रह रही नाओमी ने वापस अपने शहर बेतलेहम लौट जाने का निर्णय लिया, और अपनी दोनों विधवा बहुओं से आग्रह किया कि वे अपने देश मोआब में ही रह जाएं और पुनः अपने घर बसाएं। एक बहु, ओर्पा ने तो नाओमी की बात मान ली, लेकिन दूसरी बहु रूत ने नाओमी के साथ ही वापस जाने की ठान ली। रूत ने नाओमी से कहा: “...जिधर तू जाए उधर मैं भी जाऊंगी; जहां तू टिके वहां मैं भी टिकूंगी; तेरे लोग मेरे लोग होंगे, और तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा; जहां तू मरेगी वहां मैं भी मरूंगी, और वहीं मुझे मिट्टी दी जाएगी। यदि मृत्यु छोड़ और किसी कारण मैं तुझ से अलग होऊं, तो यहोवा मुझ से वैसा ही वरन उस से भी अधिक करे” (रूत 1:16-17)

जब नाओमी ने देखा कि रूत अपने इरादे में पक्की है तो वे दोनों बेतलेहम लौट आए और वहाँ अपनी ज़िन्दगी दोबारा स्थापित करने लगे। परमेश्वर ने रूत की दृढ़निश्चयता और नाओमी तथा परमेश्वर के प्रति वफादारी का अच्छा प्रतिफल दिया और रूत का विवाह एक संपन्न व्यक्ति के साथ हो गया, और फिर उसकी संतान के वंश से इस्त्राएल के सुप्रसिद्ध राजा दाऊद और बाद में जगत के उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह का जन्म हुआ।

 घमण्ड से तो ढिठाई आती है, परन्तु प्रेम के कारण दृढ़निश्चयता आती है। बाइबल में प्रभु यीशु के लिए आया है कि, “जब उसके ऊपर उठाए जाने के दिन पूरे होने पर थे, जो उसने यरूशलेम को जाने का विचार दृढ़ किया” (लूका 9:51) प्रभु यीशु के हम पापियों के लिए अपने जीवन का बलिदान कराने के इस प्रेमपूर्ण दृढ़निश्चय के कारण ही आज हम अनन्त जीवन पाने वाले बन सके हैं। दूसरों के पापों के लिए स्वयं मृत्यु स्वीकार कर लेने का उसका यह दृढ़निश्चय हमें उसके लिए जीवन जीने की प्रेरणा और निश्चय कर लेने की सामर्थ देता है।

प्रेम समर्पण से प्रगट होता है।

क्योंकि प्रभु यहोवा मेरी सहायता करता है, इस कारण मैं ने संकोच नहीं किया; वरन अपना माथा चकमक की नाईं कड़ा किया क्योंकि मुझे निश्चय था कि मुझे लज्जित होना पड़ेगा।यशायाह 50:7

एक साल में बाइबल: 

  • यहोशु 4-6
  • लूका 1:1-20
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