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दैनिक अध्ययन

नम्र और दीन

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MARCH 31, 2016 [बाइबल पाठ: मत्ती 5:1-10]

अंग्रज़ी भाषा के शब्द meek, अर्थात नम्र या दीन, के साथ समस्या है कि वह अंग्रेज़ी के एक अन्य शब्द weak, अर्थात दुर्बल से मेल खाता है, और सामन्यतः लोग इन दोनों शब्दों को एक दूसरे का पर्याय मानते आए हैं। एक प्रसिद्ध शब्दकोष ने meek की और विस्तृत परिभाषा देते हुए उसका अर्थ बताया है, “वह जो बहुत दब्बु है; जिसके ऊपर सरलता से हावी हुआ जा सकता है; जिसमें प्रतिरोध करने की शक्ति नहीं है; जिसमें आत्मसम्मान नहीं है।” ऐसी परिभाषाओं और आँकलन के सामने यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि फिर प्रभु यीशु मसीह ने यह क्यों कहा कि, “धन्य हैं वे, जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे” (मत्ती 5:5)।

लेकिन प्रभु यीशु मसीह के इस शब्द को प्रयोग करने का तात्पर्य और वास्तविकता इस शब्द को लेकर प्रचलित आम नकारात्मक धारणा से बिलकुल विपरीत है। परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रयुक्त भाषाओं और शब्दों के प्रसिद्ध विद्वान डब्ल्यु. ई. वाईन इस शब्द के लिए मूल युनानी भाषा में प्रयुक्त हुए शब्द के बारे में बताते हैं कि “यह परमेश्वर के प्रति दिखाए गए रवैये का सूचक है, जिसमें हमारे प्रति परमेश्वर के हर व्यवहार और बर्ताव को हम भला मानकर विश्वास के साथ ग्रहण करते हैं और उसके लिए परमेश्वर से कोई विवाद या विरोध नहीं करते”। इस बात को हम प्रभु यीशु मसीह के जीवन, शिक्षाओं और कार्यों में प्रदर्शित होता देखते हैं; हम देखते हैं कि प्रभु यीशु पिता परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने में ही आनन्दित होते थे, यह इच्छापूर्ति ही उनके जीवन का ध्येय था (इब्रानियों 10:7)।

वाईन आगे कहते हैं कि, “जो दीनता प्रभु यीशु ने दिखाई और अपने अनुयायियों से दिखाने के लिए कहा वह ईश्वरीय सामर्थ का प्रतिफल है। प्रभु यीशु मसीह दीन इसलिए थे क्योंकि स्वर्ग के असीम संसाधन और परमेश्वर की असीम सामर्थ उन्हें उपलब्ध थीं।” यदि प्रभु चाहते तो स्वर्गदूतों की सेना उनके पकड़वाए जाने और क्रुस पर चढ़ाए जाने को कभी भी रोक सकती थीं (मत्ती 26:52-53)। लेकिन उन्होंने अपने संसाधनों और सामर्थ का प्रयोग स्वार्थसिधी अथवा अपनी भलाई के लिए नहीं वरन दूसरों की भलाई के लिए ही किया।

प्रभु यीशु मसीह ने अपने अनुयायियों से कहा, “मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूं: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे” (मत्ती 11:29)। वे नम्र और दीन होने के सिद्ध नमूना थे।

आज भी प्रभु यीशु हमें अपनी नम्रता और दीनता को ग्रहण करके उस से मिलने वाली शांति और सामर्थ का अनुभव करने के लिए बुला रहे हैं।

परमेश्वर के दो निवास-स्थान हैं, एक स्वर्ग और दूसरा दीन और धन्यवादी हृदय।

तब मैं ने कहा, देख, मैं आ गया हूं, (पवित्र शास्त्र में मेरे विषय में लिखा हुआ है) ताकि हे परमेश्वर तेरी इच्छा पूरी करूं। – इब्रानियों 10:7

बाइबल पाठ: मत्ती 5:1-10

Matthew 5:1 वह इस भीड़ को देखकर, पहाड़ पर चढ़ गया; और जब बैठ गया तो उसके चेले उसके पास आए।

Matthew 5:2 और वह अपना मुंह खोल कर उन्हें यह उपदेश देने लगा,

Matthew 5:3 धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्‍हीं का है।

Matthew 5:4 धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शांति पाएंगे।

Matthew 5:5 धन्य हैं वे, जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे।

Matthew 5:6 धन्य हैं वे जो धर्म के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किये जाएंगे।

Matthew 5:7 धन्य हैं वे, जो दयावन्‍त हैं, क्योंकि उन पर दया की जाएगी।

Matthew 5:8 धन्य हैं वे, जिन के मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।

Matthew 5:9 धन्य हैं वे, जो मेल करवाने वाले हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएंगे।

Matthew 5:10 धन्य हैं वे, जो धर्म के कारण सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्‍हीं का है।

एक साल में बाइबल:

  • न्यायियों 9-10
  • लूका 5:17-39

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