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नया जन्म में क्या होता है (भाग-1)

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फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। 2 उस ने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, ‘‘हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है ; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता।’’ 3 यीशु ने उस को उत्तर दिया ; कि ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे (सही अनुवाद : नया जन्म न ले) तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ 4 नीकुदेमुस ने उस से कहा, ‘‘मनुष्य जब बूढ़ा हो गया, तो क्योंकर जन्म ले सकता है ? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश करके जन्म ले सकता है ?’’ 5 यीशु ने उत्तर दिया, कि ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ ; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। 6 क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है ; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है। 7 अचम्भा न कर, कि मैं ने तुझ से कहा ; कि तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है। 8 हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है ? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।’’ 9 नीकुदेमुस ने उस को उत्तर दिया ; कि ये बातें क्योंकर हो सकती हैं ?’’ 10 यह सुनकर यीशु ने उस से कहा ; ‘‘तू इस्राएलियों का गुरु हो कर भी क्या इन बातों को नहीं समझता।’’

 यूहन्ना 3: 3 में, यीशु ने नीकुदेमुस से कहा, ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे (सही अनुवाद: नया जन्म न ले) तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ जब ‘उसने’ ऐसा कहा, ‘वह’ हम सब से बातें कर रहा था। नीकुदेमुस एक विशेष मामला नहीं था। आपको और मुझे नया जन्म लेना ही है, अन्यथा हम परमेश्वर का राज्य नहीं देखेंगे। इसका अर्थ है, हम बचाये नहीं जायेंगे (उद्धार नहीं पायेंगे); हम परमेश्वर के परिवार का हिस्सा नहीं होंगे, और स्वर्ग नहीं जायेंगे।

नीकुदेमुस, फरीसियों में से एक था, यहूदियों के सर्वाधिक धर्मी अगुवे। मत्ती 23: 15 और 33 में यीशु ने उन से कहा, ‘‘हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय ! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है, तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो . . . हे सांपो, हे करैतों के बच्चों, तुम नरक के दण्ड से क्योंकर बचोगे ?’’ ‘‘जब तक कोई नया जन्म न ले, वह परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’

नया जन्म बेचैन करनेवाला/घबरा देनेवाला है

आज का प्रश्न है: नया जन्म में क्या होता है ? इससे पूर्व कि मैं उस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करूं, मुझे एक बहुत ईमानदार चिन्ता व्यक्त करने दीजिये जो मुझे इन संदेशों को सुने जाने के तरीकों के बारे में है। मुझे मालूम है कि संदशों की यह श्रृंखला आप में से कई लोगों को बेचैन करने वाली होगी–ठीक उसी तरह जैसे यीशु के शब्द हमें बारम्बार बेचैन करनेवाले हैं यदि हम उन्हें गम्भीरता से लें। इसके कम से कम तीन कारण हैं:

1) हमारी निराशाजनक दशा के कारण

नया जन्म के बारे में यीशु की शिक्षाएँ, परमेश्वर के पुनर्जीवित करने वाले अनुग्रह से दूर हमारी निराशाजनक आत्मिक तथा नैतिक तथा वैधानिक दशा के साथ, हमारा सामना करती हैं। इस से पूर्व कि हमारा नया जन्म हो, हम आत्मिक रूप से मरे हुए हैं। हम नैतिक रूप से स्वार्थी और बलवा करनेवाले हैं। और हम वैधानिक तौर पर परमेश्वर की व्यवस्था के समक्ष दोषी हैं और ‘उसके’ क्रोध के नीचे हैं। जब यीशु हम से कहता है कि हमें नया जन्म लेना है, ‘वह’ कह रहा है कि हमारी वर्तमान दशा निराशाजनक रूप से भावशून्य, भ्रष्ट, और दोषी है। हमारे जीवनों में विस्मयकारी अनुग्रह से हटकर, हम स्वयं के बारे में वो सुनना नहीं चाहते। अतः यह बेचैन करनेवाला है जब यीशु हमें कहता है कि हमें नया जन्म लेना अवश्य है।

2) क्योंकि हम नया जन्म उत्पन्न नहीं कर सकते

नया जन्म के बारे में शिक्षा बेचैन करनेवाली है क्योंकि यह कुछ उस का संकेत करती है जो हमारे साथ किया जाता है, कुछ वो नहीं जो हम करते हैं। यूहन्ना 1: 13 इस पर जोर देता है। यह परमेश्वर की सन्तानों का उल्लेख उन लोगों के जैसा करती है जो ‘‘वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।’’ पतरस इसी चीज पर जोर देता है, ‘‘हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद दो! जिस ने . . . अपनी बड़ी दया से . . . हमें . . . नया जन्म दिया’’ (1 पतरस 1:3)। हम नया जन्म उत्पन्न नहीं करते। परमेश्वर नया जन्म देता/उत्पन्न करता है। कोई भी अच्छा कार्य जो हम करते हैं, नया जन्म का एक परिणाम है, नया जन्म देने वाला या उत्पन्न करनेवाला नहीं। इसका अर्थ है  यह हमारे नियंत्रण में नहीं है। और इसीलिए ये हमारी निराशाजनक दशा और हमारे बाहर से ‘किसी अन्य’ पर हमारी पूर्ण निर्भरता के साथ, हमारा सामना करता है।

यह बेचैन करनेवाला है। हम से कहा गया है कि यदि हम नया जन्म न लें तो हम परमेश्वर का राज्य नहीं देखेंगे। और हमें कहा गया है कि हम स्वयं के द्वारा नया जन्म नहीं पा सकते। यह बेचैन करनेवाला है।

3) क्योंकि परमेश्वर की परम स्वतंत्रता हमारा सामना करती है

और तीसरा कारण कि नया जन्म के बारे में यीशु की शिक्षा बेचैन करनेवाली है, यह कि ये हमारा सामना परमेश्वर की परम स्वतंत्रता के साथ करती है। परमेश्वर के बिना, हम अपने स्वार्थीपन और बलवे में आत्मिक रूप से मरे हुए हैं। हम स्वभाव से क्रोध की सन्तान हैं (इफिसियों 2: 3)। हमारा बलवा इतना गहरा है कि हम सुसमाचार में मसीह की महिमा की खोज या इच्छा नहीं कर सकते (2 कुरिन्थियों 4: 4)। इसलिए,  यदि हम नया जन्म पाने जा रहे हैं, यह निर्णायक रूप से तथा अन्तिम रूप से परमेश्वर पर निर्भर होगा। हमें जिन्दा करने का ‘उसका’ निर्णय, इसका प्रत्युत्तर नहीं होगा जो हम आत्मिक लाशों के रूप में करते हैं, वरन्, जो हम करते हैं वो ‘उसके’ हमें जिन्दा कर देने का प्रत्युत्तर होगा। अधिकांश लोगों के लिए, कम से कम आरम्भ में, यह बेचैन करनेवाला है।

मेरी आशा: स्थिर करना और उद्धार, मात्र बेचैन करना/घबरा देना नहीं

 मुझे बोध है कि नया जन्म पर यह शिक्षण कितना बेचैन करनेवाला हो सकता है। और ओह, मैं कितना सावधान रहना चाहता हूँ। मैं कोमल प्राणों को कोई अनावश्यक वेदना नहीं देना चाहता। और मैं उन लोगों को कोई झूठी आशा नहीं देना चाहता जिन्होंने आत्मिक जीवन को नैतिकता या धर्म के साथ उलझा दिया है। और फिर भी मैं जानता हूँ कि उन्हें जीवन देने के लिए मेरे अन्दर स्वयं की कोई सामर्थ्य नहीं है। लेकिन परमेश्वर के पास है। और मैं बहुत आशान्वित हूँ कि जो ‘वह’ इफिसियों 2: 4-5 में कहता है, वो ‘वह’ करेगा, ‘‘परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है ; अपने उस बड़े प्रेम के कारण, जिस से उस ने हम से प्रेम किया, जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे, तो हमें मसीह के साथ जिलाया–अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।’’ परमेश्वर अपने जीवन-दायक अनुग्रह के धन को आवर्धित करना पसन्द करता है, जहाँ मसीह को सत्य में ऊपर उठाया जाता है। वो मेरी आशा है: यह कि ये श्रृंखला मात्र बेचैन नहीं करेगी वरन्, स्थिर करेगी और बचायेगी/उद्धार देगी।

नया जन्म में क्या होता है ?

अतः आइये हम उस प्रश्न की ओर मुड़ें: नया जन्म में क्या होता है ? मैं उत्तर को तीन कथनों में रखने का प्रयास करूँगा। पहले दो, हम आज देखेंगे, और तीसरा (प्रभु चाहे तो) हम आगामी सप्ताह लेंगे।

1) नया जन्म में जो होता है, वो नया धर्म प्राप्त करना नहीं है अपितु नया जीवन प्राप्त करना है।

2) नया जन्म में जो होता है, वो मात्र यीशु में अलौकिकता का समर्थन नहीं है, अपितु, अपने स्वयं के अन्दर अलौकिकता का अनुभव है।

3 )नया जन्म में जो होता है, वो आपके पुराने मानव स्वभाव का सुधार या उन्नति नहीं है अपितु, एक नये मानव स्वभाव का सृजन है–एक ऐसा स्वभाव जो वास्तव में आप हैं, और जो क्षमा किया गया तथा शुद्ध किया गया है ; और एक स्वभाव जो वास्तव में नया है, और अन्दर वास करने वाले परमेश्वर के आत्मा द्वारा बनाया जा रहा है। आइये हम इन्हें एक-एक करके लें।

1) नया जीवन, नया धर्म नहीं

नया जन्म में जो होता है, वो नया धर्म प्राप्त करना नहीं है अपितु नया जीवन प्राप्त करना है। मेरे साथ यूहन्ना 3 की प्रथम तीन आयतें पढि़ये: ‘‘फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। उस ने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, ‘हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है ; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता।’ यीशु ने उस को उत्तर दिया ; कि ‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे (सही अनुवाद: नया जन्म न ले) तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’’

यूहन्ना यह सुनिश्चित करता है कि हम जान लें कि नीकुदेमुस एक फरीसी है और यहूदियों का एक शासक है। सारे यहूदी समूह में फरीसी सबसे अधिक कठोरता से धर्मी थे। ऐसे व्यक्ति को, यीशु कहता है (पद 3 में), ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ और पद 7 में और अधिक व्यक्तिगत रूप से: ‘‘तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है।’’ अतः यूहन्ना के बिन्दुओं में से एक यह है: नीकुदेमुस का सम्पूर्ण धर्म, उसका सारा विस्मयकारी फरीसी अध्ययन व अनुशासन तथा व्यवस्था-पालन, नया जन्म प्राप्त करने की आवश्यकता का स्थान नहीं ले सकता। वास्तव में, वे नया जन्म की आवश्यकता को और स्पष्ट बनाते हैं।

नीकुदेमुस को जिसकी आवश्यकता है, और आपको व मुझे आवश्यकता है, वो धर्म नहीं अपितु जीवन है। नया जन्म का उल्लेख करने का कारण ये है कि जन्म लेना, संसार में एक नया जीवन ले आता है। यद्यपि, एक अर्थ में, नीकुदेमुस जीवित है। वह श्वास ले रहा है, सोच रहा है, महसूस कर रहा है, कार्य कर रहा है। वह मानव है, जो परमेश्वर के स्वरूप में सिरजा गया है। लेकिन स्पष्ट तमा, यीशु सोचता है कि वह मरा हुआ है। नीकुदेमुस में कोई आत्मिक जीवन नहीं है। आत्मिक रूप से वह अजन्मा है। उसे जीवन की आवश्यकता है, और अधिक धार्मिक गतिविधियाँ या अधिक धार्मिक उत्साह नहीं। उसके पास वो बहुतायत से है।

आप स्मरण कीजिये कि यीशु ने लूका 9: 60 में, उस व्यक्ति से क्या कहा था, जो यीशु के पीछे जाने से इस कारण रुक रहा था कि वह अपने पिता को गाड़ दे ? यीशु ने कहा, ‘‘मरे हुओं को अपने मुरदे गाड़ने दे।’’ इसका अर्थ है कि शारीरिक रूप से मरे हुए लोग हैं जिन्हें गाड़े जाने की आवश्यकता है। और आत्मिक रूप से मरे हुए लोग हैं, जो उन्हें गाड़ सकते हैं। दूसरे शब्दों में, यीशु ने उन लोगों के बारे में सोचा जो बहुत प्रत्यक्ष जीवन के साथ घूमते-फिरते हैं और मरे हुए हैं। उड़ाऊ पुत्र के विषय में ‘उसके’ दृष्टान्त में, पिता कहता है, ‘‘मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है।’’(लूका 15: 24)।

नीकुदेमुस को धर्म की आवश्यकता नहीं थी ; उसे जीवन की आवश्यकता थी–आत्मिक जीवन। नया जन्म में जो होता है वो यह कि एक जीवन अस्तित्व में आता है जो पहले वहाँ नहीं था। नया जन्म के समय, नया जीवन होता है। यह धार्मिक गतिविधि या अनुशासन या निर्णय नहीं है। यह जीवन का अस्तित्व में आना है। यह पहला तरीका है, यह वर्णन करने का कि नया जन्म में क्या होता है।

2) अलौकिक का अनुभव करना, मात्र इसका समर्थन या स्वीकरण नहीं

नया जन्म में जो होता है वो यीशु में अलौकिकता का मात्र समर्थन नहीं अपितु अलौकिकता का अपने स्वयँ के अन्दर अनुभव करना है। पद 2 में, नीकुदेमुस कहता है, ‘‘हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है ; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता।’’ दूसरे शब्दों में, नीकुदेमुस, यीशु में एक प्रामाणिक ईश्वरीय गतिविधि देखता है। वह स्वीकार करता है कि यीशु, परमेश्वर की ओर से है। यीशु, परमेश्वर के काम करता है। इस पर, यीशु यह कह कर प्रत्युत्तर नहीं देता कि, ‘‘का़श, पलिश्तीन में प्रत्येक जन उस सच्चाई को देख पाता जो तुम मेरे विषय में देखते हो।’’ इसकी बनिस्बत, ‘वह’ कहता है, ‘‘तुम्हें नया जन्म पाना अवश्य है अन्यथा तुम परमेश्वर का राज्य कदापि न देखोगे।’’

चिन्ह और आश्चर्यकर्म देखना, और उन पर चकित होना, और उन आश्चर्यकर्मों के कर्ता को उनके लिए श्रेय देना कि वह परमेश्वर की ओर से है, किसी को नहीं बचाता (किसी का उद्धार नहीं करता)। चिन्हों और आश्चर्यकर्मों के बड़े ख़तरों में से एक यह है: उन पर चकित होने के लिए आपको एक नये हृदय की आवश्यकता नहीं है। वो पुराना, पतित मानव स्वभाव ही पर्याप्त है, चिन्हों और आश्चर्यकर्मों पर चकित होने के लिए। और वो पुराना, पतित मानव स्वभाव, यह कहने के लिए तैयार है कि आश्चर्यकर्म को करनेवाला परमेश्वर से है। शैतान स्वयँ जानता है कि यीशु, परमेश्वर का पुत्र है और आष्चर्यकर्म करता है (मरकुस 1: 24)। नहीं, नीकुदेमुस, का मुझे परमेश्वर की ओर से भेजा हुआ एक आश्चर्यकर्म करनेवाले के रूप में देखना, परमेश्वर के राज्य की कुंजी नहीं है। ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’

दूसरे शब्दों में, जो मायने रखता है, वो यीशु में अलौकिकता को स्वीकार करना मात्र नहीं है, अपितु, अलौकिकता का अपने स्वयं में अनुभव करना है। नया जन्म अलौकिक है, प्राकृतिक नहीं। यह उन चीजों के द्वारा नहीं समझा जा सकता जो इस संसार में पहले ही से पायी जाती हैं। पद 6, नया जन्म के अलौकिक प्रकृति पर जोर देता है: ‘‘जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है ; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है।’’ शरीर वो है, जो हम प्राकृतिक रूप से हैं। परमेश्वर का आत्मा वह अलौकिक व्यक्ति है जो नया जन्म ले आता है। यीशु पद 8 में इसे पुनः कहता है: ‘‘हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहां से आती और किधर को जाती है ? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।’’ ‘पवित्र आत्मा’ इस प्राकृतिक संसार का एक हिस्सा नहीं है। ‘वह’ प्रकृति से ऊपर है। ‘वह’ अलौकिक है। अवश्य ही, ‘वह’ परमेश्वर है। ‘वह’ नया जन्म का कर्ता है।

अतः नीकुदेमुस, यीशु कहता है, नया जन्म में जो होता है वो मात्र मेरे अन्दर अलौकिक का समर्थन या स्वीकरण नहीं है, अपितु, तुम्हारे स्वयं के अन्दर अलौकिक का अनुभव है। तुम्हें नया जन्म लेना अवश्य है। और किसी लाक्षणिक प्राकृतिक तरीके से नहीं, अपितु, एक अलौकिक तरीके से। ‘पवित्र आत्मा’ परमेश्वर का तुम्हारे ऊपर आना और नये जीवन को अस्तित्व में लाना अवश्य है।

अगली बार हम पद 5 के शब्दों को देखेंगे: ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ ; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।’’ यहाँ पर जल और आत्मा किस ओर इंगित करते हैं ? और नया जन्म में क्या हो रहा है, इसे समझने में वो हमारी कैसे सहायता करता है ?

यीशु जीवन है

लेकिन आज, ‘आत्मा’ के द्वारा नया जन्म पाने और यीशु में विश्वास के द्वारा सनातन जीवन पाने के बीच, एक निर्णायक संबंध स्थापित करते हुए, मैं समाप्त करना चाहता हूँ। अब तक जो हमने देखा वो यह कि नया जन्म पाने में जो होता है, वो आत्मिक जीवन को अस्तित्व में लाने के लिए, (जहाँ वो पहले नहीं था), पवित्र आत्मा के द्वारा अलौकिक कार्य है। यीशु यूहन्ना 6: 63 में इसे पुनः कहता है, ‘‘आत्मा तो जीवन-दायक है ; शरीर से कुछ लाभ नहीं।’’

किन्तु यूहन्ना रचित सुसमाचार कुछ और को भी स्पष्ट करता है: यीशु वो जीवन है जो पवित्र आत्मा देता है। या हम कह सकते थे: वो आत्मिक जीवन जो ‘वह’ देता है, ‘वह’ केवल यीशु के सम्बन्ध में देता है। यीशु के साथ संयुक्ति ही वो स्थान है जहाँ हम अलौकिक, आत्मिक जीवन का अनुभव करते हैं। यूहन्ना 14: 6 में यीशु ने कहा, ‘‘मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता।’’ यूहन्ना 6: 35 में उसने कहा, ‘‘जीवन की रोटी मैं हूँ।’’ और 20: 31 में यूहन्ना कहता है, ‘‘यह इसलिये लिखे गए हैं, कि तुम विश्वास करो, कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है: और विश्वास करके उसके नाम से/में जीवन पाओ।’’

यीशु से अलग, कोई जीवन नहीं

अतः यीशु के साथ जुड़ने से अलग और यीशु में विश्वास के बिना, कोई आत्मिक जीवन नहीं–कोई सनातन जीवन नहीं। नया जन्म और यीशु में विश्वास के बीच संबंध के बारे में हमारे पास कहने को बहुत कुछ रहेगा। लेकिन अभी के लिए हम इसे इस ढंग से रखें: नया जन्म में, पवित्र आत्मा हमें मसीह के साथ एक जीवित संयुक्ति में जोड़ता है। मसीह जीवन है। मसीह दाखलता है, जहाँ जीवन बहता है। हम डालियाँ हैं (यूहन्ना 15: 1 से आगे)। नया जन्म में जो होता है वो यह कि नये आत्मिक जीवन का अलौकिक सृजन, और यह यीशु के साथ संयुक्ति के द्वारा सिरजा जाता है। पवित्र आत्मा हमें मसीह के साथ जैविक संयोजन में लाता है जो मार्ग, सत्य, और जीवन है। यही वो वस्तुगत वास्तविकता है जो नया जन्म में होती है।

और हमारी ओर से–जिस तरह हम इसका अनुभव करते हैं–यह है कि हमारे हृदयों में यीशु में विश्वास जागृत होता है। आत्मिक जीवन और यीशु में विश्वास एक-साथ अस्तित्व में आते हैं। नया जीवन, विश्वास को सम्भव बनाता है, और चूँकि आत्मिक जीवन सदैव विश्वास को जागृत करता तथा स्वयं को विश्वास में व्यक्त करता है, यीशु में विश्वास के बिना कोई जीवन नहीं है। इसलिए, हमें नया जन्म को, यीशु में विश्वास से, कभी पृथक नहीं करना चाहिए। परमेश्वर की ओर से, नया जन्म में हम मसीह के साथ संयोजित किये जाते हैं। यही है वो जो पवित्र आत्मा करता है। हमारी ओर से, हम यीशु में विश्वास के द्वारा इस संयुक्ति का अनुभव करते हैं।

नया जन्म और यीशु में विश्वास को कभी भी पृथक मत कीजिये

सुनिये कि 1 यूहन्ना 5: 4 में, यूहन्ना उन्हें कैसे साथ में रखता है: ‘‘जो कुछ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है, और वह विजय जिस से संसार पर जय प्राप्त होती है–हमारा विश्वास है।’’ परमेश्वर से उत्पन्न– जय प्राप्त करने की कुंजी। विश्वास–जय प्राप्त करने की कुंजी। क्योंकि विश्वास वो मार्ग है जिसके द्वारा हम परमेश्वर से उत्पन्न होने का अनुभव करते हैं।

अथवा सुनिये कि 1 यूहन्ना 5: 11-12 में यूहन्ना इसे कैसे कहता है: ‘‘और वह गवाही यह है, कि परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन दिया है: और यह जीवन उसके पुत्र में है। जिस के पास पुत्र है, उसके पास जीवन है, और जिस के पास परमेश्वर का पुत्र नहीं, उसके पास जीवन भी नहीं है।’’ इसलिए, जब यीशु कहता है, ‘‘आत्मा तो जीवन-दायक है ; शरीर से कुछ लाभ नहीं’’ (यूहन्ना 6: 63), और जब वह कहता है, कि जीवन पाने के लिए ‘‘तुम्हें आत्मा से जन्म लेना अवश्य है,’’ उसका अर्थ है: नया जन्म में, विश्वास के द्वारा हमें यीशु मसीह से संयोजित करने के द्वारा, पवित्र आत्मा हमें अलौकिक रीति से नया आत्मिक जीवन देता है। क्योंकि यीशु जीवन है।

अतः यूहन्ना 3 में यीशु के इन दो कथनों को कभी पृथक न करें: ‘‘यदि कोई नये सिरे से न जन्मे ;सही अनुवाद: नया जन्म न लेंद्ध तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता’’ (पद 3) और ‘‘जो पुत्र पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है’’ (पद 36)।

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This entry was posted on May 10, 2016 by in Articles and tagged , , , , , , , , .
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